कोलकाता : भारत में लिवर से जुड़ी बीमारियाँ तेजी से एक गंभीर जनस्वास्थ्य चुनौती बनती जा रही हैं। इसी पृष्ठभूमि में बंगाल लिवर समिट (बीएलएस) २०२६ के तहत कोलकाता में पेशेंट एंड पब्लिक अवेयरनेस एंड एंगेजमेंट प्रोग्राम का आयोजन किया गया। इस पहल का उद्देश्य चिकित्सा विशेषज्ञों और आम जनता के बीच की दूरी को कम करना था, ताकि लिवर रोगों से जुड़ी वैज्ञानिक जानकारी को सरल, व्यावहारिक और आम लोगों के लिए उपयोगी संदेशों में बदला जा सके। इस सत्र में लिवर रोगों की रोकथाम, जोखिम के आधार पर शुरुआती पहचान, टीकाकरण, समय पर जांच और जीवनशैली में आवश्यक बदलावों पर विशेष जोर दिया गया। साथ ही, उन आम भ्रांतियों पर भी चर्चा की गई, जो अक्सर सही समय पर जांच और इलाज में देरी का कारण बनती हैं।
यह सत्र अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित विशेषज्ञों की गरिमामयी उपस्थिति में संपन्न हुआ, जिनमें अमेरिका के मिशिगन यूनिवर्सिटी मेडिकल स्कूल से गैस्ट्रोएंटरोलॉजी एवं हेपेटोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. रॉबर्ट फोंटाना, सिंगापुर के नेशनल यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट डॉ. डेनियल हुआंग, आयोजन अध्यक्ष एवं अपोलो मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल्स, कोलकाता के इंस्टीट्यूट ऑफ गैस्ट्रोसाइंसेज़ एंड लिवर ट्रांसप्लांट के डायरेक्टर व प्रमुख डॉ. महेश के. गोयनका, वैज्ञानिक समिति के चेयरमैन एवं सीनियर कंसल्टेंट गैस्ट्रोएंटरोलॉजी तथा ल्यूमिनल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी के प्रमुख डॉ. उदय सी. घोषाल, और आयोजन सचिव एवं अपोलो मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल्स, कोलकाता के इंस्टीट्यूट ऑफ गैस्ट्रोसाइंसेज़ एंड लिवर ट्रांसप्लांट के कंसल्टेंट हेपेटोलॉजिस्ट, डॉ. आकाश रॉय शामिल थे।
बंगाल लिवर समिट (बीएलएस) २०२६, इंडियन नेशनल एसोसिएशन फॉर द स्टडी ऑफ द लिवर (आईएनएएसएल) की मिड-टर्म बैठक के रूप में आयोजित किया गया, जिसमें देश-विदेश के विशेषज्ञों ने हेपेटोलॉजी के क्षेत्र में हो रही प्रगति पर विचार-विमर्श किया। इसके साथ ही, इस मंच पर जन-जागरूकता और रोकथाम को एक केंद्रीय विषय के रूप में रखा गया। आम जनता के लिए आयोजित इस विशेष सत्र में विशेषज्ञों ने बताया कि कई लिवर रोग शुरुआती चरणों में बिना किसी स्पष्ट लक्षण के बढ़ते रहते हैं और जब तक लक्षण सामने आते हैं, तब तक बीमारी गंभीर अवस्था में पहुँच चुकी होती है। इसलिए जोखिम की समय रहते पहचान और नियमित जांच बेहद जरूरी है।

सत्र के दौरान विशेषज्ञों ने आज के समय में लिवर रोगों के प्रमुख कारणों पर विस्तार से चर्चा की, जिनमें मेटाबॉलिक जोखिम से जुड़ा फैटी लिवर, वायरल हेपेटाइटिस, शराब से होने वाला लिवर नुकसान, और दवाओं या सप्लीमेंट्स के गलत या अनावश्यक उपयोग से होने वाली क्षति शामिल है। वक्ताओं ने स्वस्थ वजन बनाए रखने, मधुमेह और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने, शराब का सुरक्षित और सीमित सेवन करने तथा बिना डॉक्टर की सलाह के दवाओं या सप्लीमेंट्स से बचने की आवश्यकता पर जोर दिया। साथ ही, हेपेटाइटिस बी से बचाव के लिए टीकाकरण की अहम भूमिका और हेपेटाइटिस बी एवं सी के लिए उपलब्ध प्रभावी इलाज की जानकारी भी साझा की गई, खासकर तब जब बीमारी की पहचान शुरुआती चरण में हो जाए।
इस अवसर पर डॉ. महेश के. गोयनका ने कहा, “लिवर की बीमारियाँ अक्सर तब तक खामोश रहती हैं, जब तक वे गंभीर रूप न ले लें। हमारा यह जन-जागरूकता कार्यक्रम लोगों को रोकथाम, समय पर पहचान और ऐसे ठोस कदमों के बारे में जागरूक करने पर केंद्रित था, जिन्हें वे तुरंत अपनाकर अपने लिवर की सेहत को सुरक्षित रख सकते हैं।”
डॉ. उदय सी. घोषाल ने कहा, “सही और प्रमाणित जानकारी स्वयं में एक प्रभावी जनस्वास्थ्य हस्तक्षेप है। हमने विशेषज्ञों के माध्यम से संवाद को प्राथमिकता दी, ताकि परिवार फैटी लिवर, वायरल हेपेटाइटिस और शराब से जुड़ी लिवर क्षति जैसे जोखिमों को सही तरीके से समझ सकें।”
डॉ. आकाश रॉय ने कहा, “यह पहल पूरी तरह से मरीज-केंद्रित थी। हमारा उद्देश्य था कि नागरिक समय रहते जोखिम को पहचानें, हानिकारक आत्म-उपचार से बचें और प्रमाण-आधारित, समय पर चिकित्सा सहायता लें।”
आयोजकों ने दोहराया कि उनकी प्रतिबद्धता केवल अकादमिक उत्कृष्टता तक सीमित नहीं है, बल्कि वास्तविक जनस्वास्थ्य प्रभाव सुनिश्चित करने की भी है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हेपेटोलॉजी में हो रही चिकित्सा प्रगति को इस तरह आम लोगों तक पहुँचाया जाए, जो समझने में आसान हो, तुरंत अपनाई जा सके और व्यापक समुदाय के लिए प्रासंगिक हो। सत्र का मुख्य संदेश स्पष्ट था, लक्षण आने का इंतजार किए बिना लिवर की सेहत को गंभीरता से लेना जरूरी है, क्योंकि समय पर की गई पहल जीवन बचा सकती है।
बंगाल लिवर समिट के बारे में:
बंगाल लिवर समिट की परिकल्पना पूर्वी भारत में एक ऐसे अकादमिक और जनस्वास्थ्य मंच के रूप में की गई थी, जो पूरी तरह से लिवर रोगों को समर्पित हो। यह पहल ऐसे समय में शुरू की गई, जब फैटी लिवर, वायरल हेपेटाइटिस, शराब से जुड़ी लिवर क्षति और लिवर कैंसर का बोझ इस क्षेत्र में तेजी से बढ़ रहा था। आईएनएएसएल के संरक्षण में कोलकाता के अग्रणी हेपेटोलॉजिस्ट्स द्वारा शुरू किया गया यह समिट, विकसित होती क्लिनिकल साइंस, क्षेत्रीय स्वास्थ्य वास्तविकताओं और सामुदायिक जागरूकता के बीच की खाई को पाटने के उद्देश्य से स्थापित किया गया। बीएलएस २०२६ इसी मिशन को आगे बढ़ाते हुए न केवल अकादमिक संवाद को सशक्त बना रहा है, बल्कि मरीजों की शिक्षा, शुरुआती पहचान और रोकथाम की पहलों के माध्यम से भारत में बढ़ती लिवर रोग महामारी पर अंकुश लगाने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
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